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Paandaan
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Paandaan

by Mujtaba Khan
· ISBN MANUAL-1779466109226

Description

‘पानदान’ — सिर्फ़ पान का सामान रखने की एक छोटी संदूक़ची नहीं, बल्कि एक ख़ानदानी विरासत है, जो पीढ़ियों से गुज़रते हुए मुमताज़ बेगम तक पहुँची है। यह अफ़साना एक औरत की उस नाज़ुक पर मज़बूत दुनिया की कहानी है, जो अपने हिस्से की इज़्ज़त, रुतबा और औलादों की परवरिश को उसी सलीके से सँभालती है, जैसे वह अपने पानदान को। मुमताज़ बेगम का जीवन उन तमाम औरतों का प्रतीक है, जो समय और हालात की मार झेलते हुए भी अपने भीतर की गरिमा और अपनापन नहीं खोतीं। मुज्तबा ख़ान ने इस दास्तान को उस दौर के पूरे सामाजिक परिवेश, उसकी भाषा और रवायतों समेत हमारे सामने ज्यों का त्यों रख दिया है। हर किरदार में मुहब्बत और इंसानियत की खुशबू है। भाषा में पुराने लखनऊ की नफ़ासत और क़िस्सागोई का ऐसा रंग है कि कहानी शुरू होते ही पाठक उस दुनिया में उतर जाता है — और आख़िरी पंक्ति तक वहीं ठहर जाना चाहता है। इसके लेखक मुज्तबा ख़ान प्रसिद्ध पटकथा लेखक और लोकप्रिय भाषा-शिक्षक हैं, जो अपनी रचनाओं में सामाजिक यथार्थ, इंसानी रिश्तों और सांस्कृतिक विरासत को बारीकी से पिरोते हैं।

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